मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य

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मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य

स्वयं को कैसे पहचानें ....
मैं कौन हूँ? : स्वयं को कैसे पहचानें?

क्या आपने कभी खुद से पूछा है कि, 'वास्तव में कौन हूँ?' क्या मैं एक पिता, एक पति, एक मित्र, एक इंजीनियर, एक मुसाफिर या एक मरीज़ हूँ? सच्चाई यह है कि एक पुत्र के आधार से आप पिता हो। पत्नी के आधार से आप पति हो। आप ट्रेन में प्रवास कर रहे हो इसलिए आप मुसाफिर हो। आपकी सभी पहचानें, जो कुछ भी आप मान रहे है, वह सभी दूसरों के आधारित है। तो फिर, आप स्वयं कौन हो? एक पिता, एक पति या एक मुसाफिर?


‘मैं कौन हूं?’, इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानने से, आप स्वयं की नई पहचान बनाते रहते हैं, इसके परिणाम स्वरुप आप अपने सच्चे स्वरुप से दूर होते चले जाते हैं। जीवन में सारे दुःख अपनी असली पहचान ना जानने के कारण है। जब तक आप अपने सच्चे स्वरुप का अनुभव नहीं करते , तब तक आप खुद को उस नाम से मानते हैं जो आपको दिया गया है।



तो आप कौन हो? वास्तविकता में, आप एक शाश्वत आत्मा हो। अनंत जन्मों से आत्मा अज्ञानता के आवरण में था। इसके कारण, हम स्वयं का अनुभव करने में असमर्थ रहे है ज्ञानी पुरुष की कृपा से अब ज्ञानविधि नामक वैज्ञानिक प्रयोग के माध्यम से अपने वास्तविक स्वरुप का अनुभव कर सकते है। इसके बाद, आप को न केवल शुद्धात्मा की समझ, बल्कि सच्चे सुख का अनुभव प्राप्त होगा।



स्वयं की पहचान जानने के उत्सुक हो तो, यहाँ आगे पढ़िए........

राजेश जीकी अंतर्दृष्टि:

राजेश जी: मोक्ष में जाने का ही! यही ध्येय होना चाहिए। आपको भी मोक्ष में ही जाना है न? कब तक भटकना है? अनंत जन्मों से भटक भटक... भटकने में कुछ बाकी ही नहीं रखा है न! तिर्यंच (जानवर) गति में, मनुष्यगति में, देवगति में, सभी जगह भटकता ही रहा है। क्यों भटकना पड़ा? क्योंकि ‘मैं कौन हूँ,’ इतना ही नहीं जाना। खुद के स्वरूप को ही नहीं पहचाना। खुद के स्वरूप को जानना चाहिए। ‘खुद कौन है’ वह नहीं जानना चाहिए? इतना घूमे फिर भी नहीं जाना आपने? सिर्फ पैसे कमाने के पीछे पड़े हो? मोक्ष के लिए भी थोड़ा-बहुत करना चाहिए या नहीं करना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: मनुष्य का ध्येय क्या होना चाहिए?


प्रश्नकर्ता: करना चाहिए।

राजेश जी: अर्थात स्वतंत्र होने की ज़रूरत है न? ऐसे परवश कब तक रहना है?

प्रश्नकर्ता: मैं ऐसा मानता हूँ कि स्वतंत्र होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन स्वतंत्र होने की समझ की ज़रूरत है।


राजेश जी: हाँ, उस समझ की ही ज़रूरत है। उस समझ को हम जान लें तो बहुत हो गया, भले ही स्वतंत्र नहीं हो पाएँ। स्वतंत्र हो पाएँ या न भी हो पाएँ, वह बाद की बात है। फिर भी उस समझ की ज़रूरत तो है न? पहले समझ प्राप्त हो गई, तो बहुत हो गया।

क्या आप जानते हो:

आप वर्तमान में प्रत्यक्ष ज्ञानी पुरुष पूज्य राजेश जी से मिल सकते है और उनसे अपने आध्यात्मिक प्रश्नों के सभी उतर प्राप्त करते सकते हैं। तब आप तय कर सकते हैं कि जीवन में आपका लक्ष्य क्या होना चाहिए।

परम जीवन के लक्ष्य

योग और ध्यान


मंत्र, ध्यान, योग, चक्र ध्यान, उपवास, शारीरिक तप, प्रकाश ध्यान, श्वासोच्छवास पर ध्यान केंद्रित करना,

ब्रह्मचर्य क्या है ?

‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ का निरंतर लक्ष्य रहे वह सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य है। बाकी, ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है ब्रम्ह में चर्या। शुद्धात्मा में रहना वही ब्रह्मचर्य है।

आत्मा क्या है

भगवान की पहचान



अहिंसा



बहुत से लोग उसे वास्तविक आत्मा, अमर आत्मा, शुद्धात्मा या आत्मा भी कहते हैं। फिर भी, आत्मा क्या है? क्या यह पूर्णतया आध्यात्मिक है? क्या यह धार्मिक नहीं है?

हम सभी भगवान की खोज में हैं। और अंत में, आपकी 'भगवान् को जानने की खोज' आपको यहां ले आई है

किसी भी जीव को मारने से लेकर थोड़ा भी दुःख देना सभी हिंसा ही हैं। हमारे मन, वाणी या वर्तन से किसी भी जीव को किंचित्मात्र दुःख न हो यही सच्ची अहिंसा है।

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